प्रातः स्मरणीय परम वन्दनीय
अन्तरिक्ष अनुसन्धान वेत्ता ब्रहम ऋषि योगिराज श्री प्रकाशानन्द जी
जो पावन शुकतीर्थ (शुक्रताल) स्थित महाशक्ति सिद्ध पीठ के संरक्षक है।कठोर योग साधनो के
द्वारा तप करते हुये दीर्ध काल से समाधिस्थ अवस्था मे विराजमान
होकर प्राचीन भारतीय संस्कृति के अनुसन्धान मे रत है, जो सर्व प्रकारेण राष्ट्र को महानतम बनाने मे सक्षम है।भारतीय
संस्कृति के ऐसे २ विलक्षण अनुसन्धान है,जिनका
उत्तर देने मे विश्व का सर्वोच्च विज्ञान मूक है।दैवि चिन्तन मे
ब्रहम चक्र मे स्थित होकर पुरातन महामनीषियो की तरह दिव्य लोक
लोकान्तरो मे विहार करने वाले योग योगेश्वर महावीर बजरंग बली जी की
कृपा मात्र विश्व के एक मात्र महायोगी पर समय_ समय पर दया करके ऐसे अलौकिक दृश्य दिखाये है, कि जिनका वर्णन स्थूल से परे की बात है।परम पूज्य गुरु देव
निरन्तर तपस्या मे ही लगे रहते है, कई
कई दिन समाधि मे स्थित होकर अन्तरिक्ष मे विहार करते है, दिव्य शक्तियो से सम्पर्क होता है।तभी प्राचीन भारत की
गौरवमयी संस्कृति के विषय मे अनुभव होता है। सन्त स्वयं एक तीर्थ
होते है विज्ञानशाला होते है, इसका
दर्शन अनुभव योगिराज जी को देख कर होता है।उन्होने अपने अनुसन्धानो
मे प्राचीन ज्ञान विज्ञान के साथ साथ विश्व को महान दुर्लभ ग्रन्थ
बजरंग संहिता के भी दिव्य सूत्र दिए है,बजरंग
संहिता लोक मे अप्राप्त ग्रन्थ है,
बजरंग संहिता के दिव्य विज्ञानी सूत्र जो प्राप्त हो सके
हैअनुसन्धान द्वारा वह शीघ्र ही लिपि वद्ध होकर विश्व पटल पर आ
जायेंगे और विश्व जान लेगा कि भारत विश्व गुरु किस कारण से रहा है? महायोगी के दर्शन मात्र से ही परम शान्ति का अनुभव होता है।